गुरुवार, 24 सितंबर 2015

द्वारिकाधीश अपने चारों धाम में से भारत के पश्चिमी भाग में एक धाम क्षेत्र है

जय माराज सा🙏
जय श्री द्वारकाधीश भगवान
जैसा कि आप सभी वैष्णव वैरागी जानते ही हैं कि द्वारिकाधीश अपने चारों धाम में से भारत के पश्चिमी भाग में एक धाम क्षेत्र है।उत्तर में बद्री विशाल पूर्व में जगन्नाथ जगदीश्वर के साथ शेषावतार बलदेवजी संग उनकी बहन सुभद्राजी का मन्दिर है।
दक्षिण में भगवान रामेश्वरम है जो कि द्वादश ज्योतिर्लिंग में भी आता है और चूंकि भगवान् मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी के हाथों से उनकी स्थापना और पूजा अर्चना की थी अतः वह स्थान भी वैष्णव चार धाम में भी आता है।
जैसा कि मगारामजी ने जिज्ञासा जाहिर की है कि द्वारिकाधीश यात्रा का वर्णन संतो को बताना है तो वैसे तो आपने भी सर्वेश्वर ठाकुर के दर्शन किये ही होंगे फिर भी अपने अनुभव के आधार पर संक्षिप्त में जितनी मेरी अल्प बुद्धि का स्मरण है कोशिश करता हूँ।
ठाकुर यात्रा करना हमारा परम शौभाग्य था हालाँकि हमारे पारिवारिक संस्कार के वातावरण से हमें शुरू से ही अपने स्व समाज के प्रति अपने संप्रदाय गुरू और अपने ईष्ट के प्रति गहरी आस्था का पाठ पढाया गया है, जो कि यदा कदा मेरे विचारों में आना स्वाभाविक ही है।
मैने पहली यात्रा साल 2002 में ही गुरू दिक्षा उपरान्त मेरे प्रिय स्नेही स्वसमाज बंधु प्रकाशजी भैसवाडा के संग की थी।तब हम दोनों पाली जिला वैष्णव चतु संप्रदाय परिवार परिचय स्मारिका का सर्वे संपन्न करने के कगार पर थे।तभी ठाकुर के दर्शन लालसा मन में जागृत हुई और प्रकाशजी ने मुझे बताया कि जो भी इस पुस्तक के कागजात है उस पर स्वयं ठाकुर के अधोहस्ताक्षर कराकर आयेंगे तो हमारे इस विशुद्ध कार्य में किसी प्रकार की बाधा नही आयेगी और अपनी भावना के अनुरूप कार्य सिद्ध होगा 
और वैसा ही हुआ।
हम दोनों द्वारिका धाम गये ठाकुर की छवि का उल्लेख करना मेरे सामर्थ्य में नही।
हमारे पास कागजात का बैग था लेकिन ठाकुर की अनुकम्पा देखिये उन्होंने कहा कि क्या है इसमे हमने कहा ठाकुर के दस्तखत कराने है हमारी समाज के अनमोल दस्तावेज है।उस समय बाबरी विध्वंस के बाद सभी मुख्य मंदिरो में भारी सुरक्षा कर्मी थे।
फिर भी उन्होंने हमारी भावनाओं का आदर करते हुये अंदर ठाकुर के श्री चरणों में पुरा बैग पुजारीजी ने खंगाल दिया और कहा जाओ आरती पश्चात ही ठाकुर हस्ताक्षर करेंगे।
हमे यह आभास हो रहा था कि वहां का वातावरण देखकर मानो पूरी सृष्टि का संचालन इसी कार्यालय से होता है मन्दिर के एक और देखो तो उनके चरणो में विशाल समुद्र उनके चरण पखार रहा है मन्दिर के चारो तरफ सूर्य चन्द्र उनकी परिक्रमा करते हुए दिखाई देते हैं।ठाकुर के ठीक सामने मां देवकी जी का मन्दिर है जब भी पट खुलते है तो पहले उनकी माताजी के दर्शन करते है एक तरफ दाऊजी महाराज का मन्दिर है तो दूसरी तरफ उनके पुत्र और पौत्र प्रद्युम्न सह अनिरूध्द जी का।
बाकी उसी प्रांगण में अनेक देवी देवता उनकी सेवा आराधना में उपस्थित है।
ठीक पीछे शंकराचार्य जी पीठ है।
मन्दिर में नित्य प्रति 6:30 बजे मंगला आरती,10:30 श्रृंगार आरती 12बजे राजभोग 1बजे दर्शन विराम शाम 5 बजे उत्तथापन 7:30 संध्या आरती 8:30 शयन आरती 9:30 मन्दिर बंद।
और इसके अलावा भक्त गण द्वारा अन्नकूट या 56 भोग आरती भी अपने भाग्य में हो तो सबसे शानदार ठाकुर ठाठ दर्शन होते हैं।
मन्दिर के तल से शिखर तक की लंबाई 150 मीटर है उसका अद्भुत नजारा कभी न भुलाने वाला है और रोज उस पर कम से कम पांच बार ध्वजा बदलती है बहुत ही लंबी और सागर की हवा से लहराती हुई।
आनंद ही आनंद 
आज कोई भक्त अगर चाहता है कि मुझे भी ध्वजा चढानी है तो दो तीन साल में उनका नंबर आता है अब आप हिसाब लगा सकते हो कि दिन मे 5 बार और तीन साल में नंबर आता है।
रही बात दर्शन व आरती की तो ऐसा अलौकिक दृश्य मैने कही अन्यत्र महसूस नही किया।
भक्त भी वहा पर सब पक्के और शुद्ध होते है वो ही दिखाई देते है।
सब ठाकुर की छवि से एक पल भी ध्यान नही हटाते।
हमारा अनुभव यह कहता है कि देखो सा वृन्दावन मथुरा रामेश्वरम जगन्नाथ उज्जैन महाकालेश्वर श्री शैलेमल्लिकार्जून घूष्मेश्वर परली वैजनाथ भीमाशंकर त्रयम्बकेश्वर सोमनाथ तिरूपति वैष्णोदेवी और भारतवर्ष के लगभग सभी बडे मंदिर में दर्शन किये है लेकिन कही भी मन्दिर परिसर में श्री विग्रह के सामने या तो खडे रहने नही देंगे या आपकी ईच्छा दर्शन कर जाने की होगी।लेकिन यहाँ ऐसा नही है आराम से सुबह से शाम तक जब जब कपाट खुले है मनोहर छवि के दर्शन करते ही जायेंगे बाकी कुछ याद नही आयेगा आप आरती के समय नृत्य करेंगे ही करेंगे उस सुरम्य दुन्दुभी और नगाडो की थाप पर।भाव विभोर और आनंदमय वातावरण।
और समुद्र स्नान का अपना ही आनंद है वहाँ से दो किलोमीटर के भीतर ही रूकमणीजी का मंदिर है वह भी आधी यात्रा की मालकिन हैं उस मंदिर के बारे में बताते है कि मुनि दुर्वासा को रथ में बिठाकर भगवान द्वारिकाधीश और दूसरी तरफ रूकमणीजी रथ को खींच रहे थे रूक्मनी जी को प्यास लगी तो भगवान ने रथ रोककर अपने पैर के अंगूठे को जमीन में दबाकर वहाँ गंगा प्रकट की और रूक्मनी जी की प्यास बुझाई तब दुर्वासा मुनि को क्रोध आया और कहा कि आपका पहला धर्म हमे पानी पिलाना था जाओ मै तुम्हे श्राप देता हूं कि तुम दोनो अलग अलग रहोगे और द्वारका में पानी खारा हो जाएगा।
आज भी उस मन्दिर परिसर में मीठा पानी प्रसाद मिलेगा अन्यत्र नही।
उनके दर्शन कर हम आगे बढते है तो बारह ज्योतिर्लिंग मे से एक नागेश्वर भगवान का मन्दिर आता है जिसका जिर्णोद्धार टी सीरीज के मालिक स्व.गुलशन कुमार ने कराया है फिर आगे गोपी तलाव आता है जहां पर वृन्दावन से ठाकुर के पीछे पीछे गोपीया आई थी उनके स्नान स्थल को गोपी तलाव कहते है वही तलाव की मिट्टी को गोपीचंदन कहते है हमारे निम्बार्क संप्रदाय के तिलक उसी तलाव के गोपीचंदन से करते है।और एक कहानी यहां की यह बताते है कि अर्जुन गोपीयो के संग आये थे और लूट पाट हुई थी उनका मान मर्दन किया था ठाकुर ने।
गोपी काबा लूटिया 
वही अर्जुन वही बाण
ऐसा ही कुछ दोहा है।
फिर आगे जाकर समुद्र मार्ग से भेट द्वारिकाधीश के दर्शन करते हैै जहां पर ठाकुर का महल था और सुदामा जी से यही भेंट की थी इसलिए इस स्थान को भेंट द्वारका कहते है
पहले दर्शन किया उसको मूल द्वारिका कहते हैं जहां उनका ऑफिस/दरबार था।
यहाँ पर चावल दान का महत्व बताते है।
इसके आगे जाना चाहे तो पिता पुत्र हनुमानजी और मकरध्वज का मन्दिर भी है
बहुत सारा वृतांत है लिखने में कम ही होगा।
हम पहली बार गये तो अब रहा नही जाता हर तीन चार महीने मे ठाकुर को मिलना ही पडता है।
अब भी 6 जुलाई से 10 जुलाई तक श्री ठाकुर शरण में निवेदन करने जा रहा हूं कि हे ठाकुर चारभुजा पैदल यात्रा जो कि श्री द्वारिकाधीश मंडल आयोजित करती है निर्विघ्न आनंदमय संपन्न हो👏👏👏👏👏
कुछ लिखने में अति हो गया हो तो क्षमा करना👏🌹🙏
विनीत
जेपी वैष्णव वैरागी
श्री द्वारिकाधीश मंडल