आज मैं आपके मध्य समाज की एकता के लिए कुछ आवश्यक बातें रखना चाहता हूं जैसा कि समाज का हर बंधु चाहता तो है कि हमारे समाज में एकता होनी ही चाहिए।
एकता का अर्थ और उसका मूल भाव है सबके विचार मिलना।
इसके लिये हमने आज दिन तक शिवाय एकता एकता एकता का नाम ही लिया है कार्य नही किया है।
एकता के धरातल से जुडे कुछ मुख्य तत्व है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है।
सर्वप्रथम हमारा समाज वैष्णव वैरागी है तो उस समाज के प्रत्येक नागरिक में वैष्णवता का भाव होना चाहिये ।सबका भाव शुद्ध होगा तो समाज में फैली एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या जलन प्रतियोगिता पद प्रतिष्ठा आदि का खात्मा अवश्य होगा।
और जब ऐसे भाव का खात्मा होगा तो विकास की राह पर चलना आसान हो जाएगा।
ऐसे भाव को खत्म करने के लिए हमारे वैष्णवीय संस्कारो की जरूरत होगी इसके लिए हमें अपने गुरु द्वारों हमारे संप्रदाय आचार्यों हमारे ईष्ट और माता पिता समाज के प्रति गहरी आस्था होनी आवश्यक है।
सबके सब इस उपरोक्त मामले में बिखरे हुए हैं किसी की आस्था किसी बडे टी.वी.पर्दे पर बडे बडे प्रवचन देने वाले स्वयंभू साधुओ को गुरू बनाते हैं चाहे वह पर्दे के पीछे कितने ही अनैतिक कार्य में सहभागी हो यहाँ पर एक बात समझने योग्य यह है कि मेरी उनकी आलोचना करने की बिल्कुल इच्छा नही है और न ही यह कहना चाहता हूं कि उनसे ज्ञान नही लेना चाहिए ।
मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि अपने तो अपने होते है।
हमारी खुद की बनी बनाई सनातन और पुरातन आचार्य परंपरा है।हमें सर्वप्रथम तो किसी दूसरे को गुरू बनाने की आवश्यकता नही है फिर भी शास्त्र के अनुसार बनाना ही है तो अपने गौत्र द्वारा में जाकर गुरू दिक्षा लेनी चाहिए और उनमें हमे आस्था प्रकट करनी है, किसी बंधु को अपने द्वारा में योग्य गुरू किसी दृष्टि से नही प्रतित होता है या वहाँ कोई महंत उपस्थित नही है तो अपने संप्रदाय के किसी भी योग्य आचार्य से दिक्षा लेनी चाहिए।
ईष्ट भाव-
हमारे सबके ईष्ट भी आचार्य परंपरा में पहले से ही है उन पर पूर्ण विश्वास होना आवश्यक है ।
हम यदा कदा इधर उधर भटकते ही है । जीवन है और जीवन संघर्ष है छोटी मोटी समस्या कर्म के आधार पर हर मानव को आती ही है उस समय परिस्थिति में हमें मजबूती का परिचय देना है जबकि ऐसे समय में हमारे बंधु भी भोपा, भल्डा, बायो,मोमा, खेतला आदि की लाईन में खडे रहते है यह बहुत ही चिंताजनक विषय है
अरे हम कौन है और कहां जा रहे है।हमारे शास्त्रों में तो हमें इन शक्तियों से भी ऊपर बताया गया है हम माराज है ठाकुर के पी.ए.
और ठाकुर सर्वेश्वर अर्थात सर्व शक्तिमान।
कई वैष्णवों को पूरब पूजते देखा गया है और कईयों को ओमबना के भजन सुनते हुए।
यहां भी मकसद दूसरे देवी-देवी - देवताओं की आलोचना करना नही और न ही किसी की भावनाओं को आहत करना है पर इस विषय पर भी हमारे समाज का बहुत नुकसान हो रहा है।जब तक शुद्ध भगवान के प्रति एकनिष्ठ भाव नही तब तक मन में अच्छे भाव नही जागृत होंगे और यह भाव समाज को एक करने में सहायक होगा।
जब सर्व शक्तिमान आप ठाकुर को मानते हो तो भटकना क्यो???
इसका मतलब यही होता है कि आपको सीतारामजी राधेश्याम जी हनुमानजी सीधे साधे लगते हैं हमारा काम कोई दूसरा करता है।
यह चमत्कार वाली और स्वार्थ की सोच है।
आप दृढ विश्वास रखिये अपने इष्ट पर आपको सर्वगुण संपन्न बनाएंगे जिसके आधार पर आप कर्म अच्छे कर हर प्रकार का जीवन में आनंद लाभ प्राप्त करेंगे।
वैरागी भजनों की भी अपनी व्यवस्था सबसे सुन्दर है ऐसे भजन हर किसी के गाना बस की बात नही।
वैरागी भाव से समयानुसार हरिजस, सौरठ, हेली, फकीरी, प्रभाती आदि 36 राग रागिणी वाले भजनों के साथ सबका एक आलाप के साथ गाना और उतार चढाव के साथ डबल ढोलक थाप।
आजकल भजन के नाम पर भी अपने बंधु दूसरे समाज के कलाकार बुलाकर उसे मनोरंजक आरकेस्ट्रा प्रोग्राम बना देते हैं यह हमारे आनंद को धीरे धीरे कम ही करेगा।
वैरागी संस्कार में अनेक बात तिलक, जनेऊ, शिखा जितना पालन कर सको करो।
इससे हमारे समाज के भाव शुद्ध होंगे।
उपरोक्त बातें समाज में प्रचारित कर सबको जागृत कर अपनी गौरवशाली समाज के मान मर्यादा और अनुशासन फिर से स्थापित किया जा सकता है।
विचारों की एकता के लिए उपरोक्त बातें तो आवश्यक है ही साथ साथ में हमारे समाज के एक धव्ज, एक संबोधन, एक नारा, एक प्रतिक चिन्ह हर स॔गठित समाज के लिए आवश्यक तत्व होते है जो कि पहले से निर्धारित है।
आजकल इनकी भी हालत खस्ता कर दी है हमने।
आधुनिकता के चक्कर में कोई जय सियाराम तो कोई जय श्री कृष्ण कोई राधे राधे कोई हरि ऊॅ तो कोई जय गोपालजी
अरे बंधुओ जरा चिंतन किजिये एक समाज है तो संबोधन भी आपस में एक होना चाहिए।
माना कि हमारी चार संप्रदाय है और सबकी पूजा ईष्ट अलग अलग।
रामानंद संप्रदाय के ईष्ट श्री सीताराम जी युगल उपासक।
निम्बार्क संप्रदाय के श्री राधेकृष्ण युगल उपासक।
मध्व संप्रदाय के गोपालकृष्ण ( गाय के साथ कृष्ण ) एकल उपासक।
विष्णुस्वामी संप्रदाय के लड्डू गोपालजी (बालकृष्ण)
एकल उपासक।
और चारों के भगवान दासानुदास श्री हनुमानजी महाराज।
लेकिन समाज तो एक है और हमारे ही पूर्वज इसकी व्यवस्था "जय माराज" शब्द से कर दी है।
ज्ञात हो कि जय माराज शब्द का एक अर्थ अयोध्या पति मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्रजी महाराज और द्वारिकाधीश श्री कृष्ण चंद्र जी महाराज का संयुक्त युगल जयघोष ही है।
महाराज+महाराज=जय माराज
ऐसे तो सांवरिया थारा नोम हजार तो क्या एक समाज के लिए एक संबोधन एकता प्रदर्शित करेगा या हजार????
भगवान नाम स्मरण अलग मुद्दा है और समाज संबोधन अलग ।
इन बातों का पालन हमे करना हमारी एकता के प्रदर्शन के लिए आवश्यक है।
गिरी, भारती तक आपस में मिलते हैं तो जय जय हरि या ऊॅ नमो नारायण करते है जबकि उनके आराध्य महादेव है।रावल समाज वाले जय महादेव करते है राजपूत जय श्री और राजपुरोहित जय रूघनाथजी री।
तो क्यों नहीं हम इन आवश्यक एकता के तत्वों पर ध्यान नही देते।
जहां तक दूसरे समाज के विकास का मामला है तो उनमें उसी समाज के धर्म गुरूओं की अहम भूमिका है जैसे खेतारामजी ने राजपुरोहित समाज में राजारामजी ने चौधरी समाज में और जैन समाज के साधुओ की उनके समाज में एकता के लिए कितना योगदान दिया है यह सबको पता है।
इस विषय पर भी हमारा ही ध्यान नही है धर्म गुरूओं पर।
उनको पकडना हमारा काम है उनका नही।
समाज के हर छोटे छोटे बिन्दुओं में एकता छुपी हुई है।
उपरोक्त जितने भी बिन्दु है यह मेरे निजी विचार हैं समाज के प्रति।
किसी की भावना आहत करना मेरा मकसद नही है।
इसको कोई बहस का मुद्दा नही बनायें।
कई दिनों से इस विषय पर अपना मन हल्का करना था तो लिख दिया।
वैसे हम श्री द्वारिकाधीश मंडल द्वारा कई बिन्दुओं पर पिछले तीन साल से कार्य कर रहे है उस वाट्सअप ग्रूप में हम सभी गर्व के साथ जय माराज का आन्दोलन सफलतापूर्वक चला रहे हैं और उसका परिणाम भी अन्य ग्रूप में दिखाई दे रहा है।
हमे "वैष्णव वैरागी" समाज मिलकर जागृत करना है।
आपका जेपी वैष्णव वैरागी
-श्री द्वारिकाधीश मंडल