गुरुवार, 24 सितंबर 2015

आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति॥

आकाशात्पतितं तोयं
यथा गच्छति सागरम्।
सर्वदेवनमस्कारः
केशवं प्रतिगच्छति॥
अर्थात :-
आकाश से गिरा हुआ पानी जैसे समुद्र में जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को किया गया नमस्कार श्रीहरि (श्रीकृष्ण) को जाता है॥
तो,
इस बात को ऐसे भी समझ सकते हैं कि अंत में श्री कृष्ण तक पहुंचता है वाया वाया। 
वाया का मतलब आप समझते होंगे।
फिर भी बता देता हूँ, मुझसे रहा नही जाता।
वाया का मतलब होता है समय की बर्बादी, रिश्वत देना (वहां तक नमस्कार फाईल पहुंचाना)
तो क्यो हम इतने वाया से  गुजरे, जबकि हम तो उसी ठाकुर के खासमखास है।
हर व्यक्ति के तीन जन्मदाता होते हैं-माता, पिता और समाज
माता-पिता के बारे में सभी को ज्ञात होता है कि ये हमारे जन्मदाता है।
पर जिस समाज में हमने जन्म लिया हैं अतः वह भी जन्मदाता है, उसे इसलिए ही मां बाप कहते है।
समाज से किसी भी प्रकार की गद्दारी करना मतलब मां बाप के साथ गद्दारी करना होता हैं।
अतः यदि कोई समाज का व्यक्ति यह सोचता है कि मैने समाज के लिए इतना किया, ये किया वो किया 
यह अपने आप में हास्यास्पद है
क्योंकि जैसा कि मैंने उपरोक्त बताया है कि जन्मदाता का हमारे ऊपर लोण/ऋण/कर्ज होता है यह ऋण कभी चुकाया ही नही जा सकता।
जब चुकाया ही नही जा सकता तो क्यों कहते हो मैने सब कोशिश कर दी है, ये कर दिया, वो कर दिया, अब नही होता मुझसे?
अरे भाई किसके लिए करते हो??
बंधुओं मां बाप और समाज के लिए जितना कर सको करो, कम ही है ऋण तो नही उतर सकता पर कम तो कर सकते हैं।
वैसे समाज की एकता के अनेक मायने है
कहते सब है कि एकता होनी चाहिए कोशिश भी करते हैं
कोशिश करते करते बीच रास्ते में कोई स्वार्थ भारी पड जाता है
हमें बस यही सावधान रहना है।
हम या तो पद के आगे बेबस हो जाते हैं या यह समझ लेते है कि मेरे बिना यह एकता संभव ही नही या किसी व्यक्तिगत रिश्तेदारी के पक्ष में समाज के अहित की चिंता ही नही कर रहे होते है।
पुरी महाभारत कथा एक लाइन में"कथा है पुरूषार्थ की ये स्वार्थ की परमार्थ की।"
तीन अर्थ पर टिकी हुई है महाभारत
स्वार्थ, पुरूषार्थ और परमार्थ
स्वार्थ त्याग कर पुरूषार्थ कर परमार्थ को पाओ।
101% अपने गंतव्य लक्ष्य प्राप्त करोगे।
एक और विशेष बात बीच रास्ते से हमारे कई समाज सेवी लौटकर आ जाते है उनको गिराने का कार्य हम ही करते है
और गिराने के हथियार भी खतरनाक रखते है पहले उनके द्वारा की गई समाज सेवा की प्रशंसा के पुल बांधेगे फिर या तो वह खुद ही संतुष्ट हो जाता है नही तो दूसरे उसी पूल की एक एक ईट खीचकर पूल को गिराने की कोशिश करते देखा गया है।
अतः न प्रशंसा के चक्कर में आना है न पद के।
प्रशंसा को slow poison धीमा जहर भी बताया गया है।
ठीक है कोई दिल से हौसला बढाना भी चाहिए और उनका मान भी रखना चाहिए पर सावधानी रखना।🙏🙏
यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रता।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्ध्याजिनोऽपि माम।।
गीता 9/25
देवताओ को पूजने वाले देवताओं को, पितरो को पूजने वाले पितरों को और ठाकुर कृष्ण कहते हैं मुझे पूजने वाले मुझे ही वैकुण्ठ में प्राप्त होते है जहाँ मेरा निवास है।
वैष्णवों में वैराग्य भाव होते है और वे श्रेष्ठ है वह मेरी ही पूजा अर्चना करता है तो वह अविनाशी वैकुण्ठ धाम को ही प्राप्त होते हैं।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम( गीता 8/21)
👆अर्थात मुझे प्राप्त होने वाला आवागमन से मुक्त हो जाते हैं मतलब 84 लाख योनियों की झंझट खतम।
जबकि सांसारिक और अन्य देवी देवताओं को पूजने वाले अपने कर्मों से स्वर्ग या नरक आदि लोको को प्राप्त होते हैं।
ते तं भुकत्वा स्वर्ग लोकं विशालं, क्षीणे पुण्ये मृत्युलोकंविशन्ति (गीता9/21) के अनुसार पुण्य पाप के भोग करके वापस मृत्युलोक की 84 लाख योनियों में चक्कर काटने को बाध्य होते हैं।
तार्किक सार यही होता है कि वैष्णव वैरागीयो के अपने आराध्य श्री रामकृष्ण और उनकी शक्ति सीताराधा की ही पूजा अर्चना भक्ति श्रद्धा करके मृत्यु के बाद वैकुण्ठ धाम को ही प्राप्त होते है पुनः मृत्युलोक को नही।
 शिवजी परम वैष्णव हैं।क्योंकि उनका सभी 12 महाभागवत में गिनती व वर्णन हैं।चूँकि महाभागवत विष्णुजी से संबंधित शास्त्र हैं इसलिए शिव जी को परम वैष्णव कहा गया है।
स्वयंभूर्नारद: शम्भु: कुमार: कपिलो मनु:।
प्रह्लादो जनको भीष्मो वलिर्वेयासि किवर्यम।।
ब्रम्हा, नारद, शंकर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वयंभुवमनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बली, सुकदेवजी और यमराज ये 12 महाभागवत है।
पद्म पुराण में खुद महादेव कहते है -मैं भी भगवान विष्णु की भक्ति के प्रसाद से वैष्णव हुआ हूँ, और कल्याण हेतु वैष्णवों को गोपीचंदन तिलक, तुलसी माला धारण करना चाहिए।
तुलसी पत्र मालां च तुलसी काष्ठं संभवाम्।
घृत्वा वैष्णव ब्राह्मणों भूयान्मुक्ति भागी न संचय।।
।।श्री रामानंदी बीज मंत्र।।
आदी वैराग सनातन धर्म।
दण्डकमंडल वैष्णव कर्म ।।
वैष्णव कर्म रहे लवलाय सो जोगेश्वर परम तत्व में रहे समाय।
गगन मंडल में ज्योति प्रकाशा
जहा सनकादिक करे निवासा।।
चंचरीक धून नुपुर बाजे त्रिकुटी नाद अनहूत धून गाजे।
सुखमन सदा जै जै करे।
वैराग बीजमंत्र नित्य उच्चारे।
वैराग्य बीज मंत्र को धरी ध्यान।
काया मध्ये त्यावे विश्राम।
कोटी दिप घट भीतर जेरे।
अंत काल भय व्यापे नहीं।।
यमदूत डर से नही आवे, जो अंत वैराग बीज मंत्र हृदय धरे।
सहीज मंत्र ते वैष्णव सही।
-वैष्णव-
वैष्णांना लक्ष्णामि कल्पकोटिश तै रपि।
सम्यग्वक्तुं न शक्तोस्मि संक्षेपाच्छणुसतम।।
संसारों वैष्णवाधीनों देवा वैष्णव पालिता:।
अहंच वैष्णवा धिनस्तस्माच्छेष्ठाश्च वैष्णवा:।।
जगत पिता ब्रम्हा जी ने जब जगदीश्वर जगदीश श्री विष्णु से पद्मपुराण में पूछा-वैष्णव कौन???
श्री हरि कहते हैं वैष्णवों के लक्षण तो सौ करोड कल्पों में भी अच्छी तरह से कहने में तो स्वयं भी असमर्थ हूँ।संक्षेप में कहता हूँ-
सारा जगत वैष्णवों के अधीन है, देवताओं की रक्षा वैष्णवों से होती है और मैं भी वैष्णवों का दास हूँ।अत:वैष्णव श्रेष्ठ है।
वैष्णवों को छोडकर पल मात्र भी दुसरी जगह ठहर नहीं सकता कारण कि वैष्णव मेरे बंधु है।ईष्र्या द्वेष जलन रहित दयालु, सब जीवों के हितैषी, सत्यवक्ता, धर्मोंपदेशक व स्वयं धर्माचरणरत, गुरु सेवा परायण, विष्णु व तुलसी शालिग्राम (श्री हुलुलूलु) की पूजा अर्चना हरि किर्तन करते हैं तथा कन्यादान व अतिथि सत्कार में परम श्रद्धा रखते हैं।
 जब भी हम श्री द्वारिकाधीश/रामेश्वर/ बद्रीनाथ /जगन्नाथ दर्शन जाते हैं तो वहां हमें आत्म गौरव का अनुभव होता है।
क्योंकि ये हमारे वैष्णवों के चारों धाम हैं । आजकल हम अपने मुख्य ठाकुर स्थानों को छोडकर इधर उधर अपनी आस्था को छिन्न भिन्न कर रहे हैं वह निश्चय ही वैष्णवो के लिये चिंता का विषय है।
इन चारों धाम के अलावा चारभुजा/श्री नाथजी /साॅवलसा/डाकोर रणछोडराय/वृन्दावन बांके बिहारी /अयोध्या सीताराम जी एवं इनके सेवक श्री हनुमानजी के स्थान भी हमारी आस्था के केन्द्र में परम्परागत व संस्कारो से जुङे है।
संस्कार भीतरी चीज है, धर्म ऊपरी।
धर्म सिर्फ शरीर का  अस्थि पंजर नहीं मांगता वह हर एक से समूची आत्मा की मांग है।आत्मा के सुसंस्कार के लिए ही मन्दिर और मूर्तियों का निर्माण एवं प्रतिष्ठा की जाती हैं।
एक खास बात यह है कि हम प्रतिमा को इसी भावना से दण्डोत करते हैं कि उनके सदगुण हमारी आत्मा में भी प्रकट हो और अहंकार नष्ट हो।
आजकल धर्म की आङ में हर जगह आडम्बर पाखंडता पनप रही है।धर्म स्थल जन समाज के जन जागरण के, मानव सेवा के, संगठन के, एकता के, पारमार्थिक सेवा के समाज केन्द्र हैं।इस वक्त बाजार में सब बिकाऊ दिखाई दे रहा है चाहे वह साई के भगवान होने की माकेर्टिंग हो या आसाराम की भीङ को देखकर गुरू बनाने की अंधी श्रद्धा।
इससे हमारे वैष्णवीय मूल्य कम हो रहे हैं हम भूल गये हैं कि समाज की नींव का आधार शुद्ध आचार वाले संस्कारशील व्यक्ति ही है।नकली धर्म स्थल एक सस्ती दुकान है इसलिए हमारे धर्म और धर्म स्थानो का पतन हो रहा है।
🙏🙏
वैष्णव वेद विद्या के उपदेशक, ज्ञानीजन, भक्ति परायण, परनारी में नपुंसक भाव रखने वाला तथा एकादशी का व्रत श्रद्धा से करते हैं।
मेरे नामों का संकीर्तन करने वाला ही वैष्णव कहलाता है।
ठाकुर मन्दिर निर्माण कर्ता, तुलसी कमल की माला धारी को ही वैष्णव जानना चाहिए।
हे ब्रम्हा जी जो हमेशा मेरे ठिकानों पर झाडू पोचा लगाकर वहां दीपक से प्रकाश करते हैं।
मेरे चरणामृत से जिनके मस्तक सींचे जाते हैं और मेरे प्रसाद को ही सेवन करते हैं।
जो गरीबों की सेवा करते हैं, हिंसा, काम, अभिमान, क्रोध आदि मनोविकारों को त्यागते है जो लोभ मोह से परे है।
अर्थात हे ब्रह्मन!
वैष्णव सर्वगुण संपन्न होते हैं अत:आपको भी वैष्णव बनना योग्य है जिस कुल में एक भी वैष्णव का जन्म होता है वह कुल पाप मुक्त हो जाता है।
भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने मुख से वैष्णवजन के लक्षण बताकर उनके महत्व को बताया यह हमारे चतु:सम्प्रदाय वैष्णवों के लिए अनुकरणीय है।
जय माराज सा🙏
जय श्री हुलुलूलु
श्री विष्णु भगवान ने ब्रह्मा जी से कहा-जो द्वारका से गोपी तलाव से गोपीचंदन से ललाट में तिलक करता है उसका पुण्य करोड गुणा बढ जाता है।
यहां तक कि क्रियाहीन, श्रद्धा के बिना भी , किसी भी समय हमेशा तिलक धारण करता है वह मेरे वैकुण्ठ धाम में आकर देवस्वरूप बन जाता है।
उसकी कभी अकाल मृत्यु नही हो सकती और जिस घर में हमेशा गोपीचंदन रहता हो उस घर में मैं हमेशा लक्ष्मी के साथ रहता हूँ।
मरते समय तिलक लगा रहता है तो वह भले ही गौहत्यारा , बाल हत्यारा, ब्रम्हहत्यारा  हो तो भी वह मनुष्य मेरे ही लोक में आयेगा।
यमराज अपने दूतों से कहते हैं-
दूता श्रृणुत यभ्दालं गोपीचंदन लान्छितम्।
ज्वल दिन्धनवत्सोऽपि दूरे त्याज्यः प्रयत्नः॥
हे दूतों ! तुम जिसके मस्तिष्क पर वैष्णव गोपीचंदन तिलक लगा हो उस प्रभावशाली व्यक्ति को दूर से ही छोड देना यदि पास जाओगे तो जलकर भस्म हो जाओगे।
ज्ञान -धर्म की बातें करते, पर स्वार्थी जीवन जीते हैं।उन्नति पराई देख देख कर, ईर्ष्या में जलते रहते हैं।वे वैष्णव नही, दुर्जन कहलाते हैं।।जो अपने और पराये से, 
बेमतलब लडते भिडते है।भाषा उनकी कडवी खारी,हरदम झुठ बहाने बनाते हैं।वे वैष्णव नही, दुर्जन कहलाते हैं ।।
नहीं जरा सी सहनशीलता, मर्यादा अनुशासन का भान नहीं है, भाव नहीं त्याग सेवा समर्पण के,फिर भी वे इतराते है।
वे भी वैष्णव नहीं, दुर्जन कहलाते हैं।।ईमान धर्म कर्म से नही वास्ता,पढे लिखे निष्क्रिय अज्ञानी रहते हैं।पर निंदा ही जिनकी आदत, नियत नहीं निर्मल होती हैं।
वे भी वैष्णव नहीं, दुर्जन कहलाते हैं।।कहत जगदीश, जो नर छोडत दुर्गुण जीवन माॅय,ते नर पावत गौरव यश जग माहीं।पाते मान वे घर परिवार और समाज में, सच्चे वैष्णव बन जाते हैं।
वे सज्जन कहलाते हैं।।
******जे.पी. वैष्णव आहोर*****