संत चार कर मनमे विचार
वो तीर्थ नहाने चाले धाम।
जूनागढ़ में रेन एक लीना विश्राम।
चोरन का डर सुना राह में रखो मती तुम पल्ले दाम लिखालो हुंडी।
ओ महाराज लिखालो हुंडी।
हारे खर्च बिन विदेश में नही चलता काम।
दोहा:खरची बिन चलता नही तीर्थ में क्या काम जी।
संतजन पूछत फिरे सेठ को सिरनाम जी।
संत कहे और कौन सेठ निज नाम जी।
मसखरा ने करी मसखरी जाओ नरसी के द्वार जी।।
चौ:संत चले सीधे ही बजारा।
कोई तो बताओ मेहता नरसी का द्वारा।।
तुम्बा री बेल जठै तुलसी रा थाणा।
वठे नरसीजी करत आनंदा।।
तुम्बा तुलसी देख संत ने ये क्या दौलत धारी है।।
लिखी जो हुंडी ओ महाराज ज्योरी सांवल सेठ सिकारी है।
जूनागढ़ में नरसी मेहता भगत हुओ एक भारी है।।
संत कहे नरसी के ताहि सुण मेहताजी मोरी बात ।
मोरे पल्ले हा रे रोकड़ा खरची का रूपया सौ सात।
द्वारापुरी में हुंडी लिखदो रोकड़ लेवो अपने हाथ।
हा रे द्वारका माको तो जानो प्रभात।।
दोहा: नरसी कहे संतो को ताकीद नाही कीजिये।
प्रात:हुंडी में लिखू जा सांवल को दीजिये।
संतजन कृपा करो विश्राम याही कीजिये।
भोग लगत है ठाकुर को प्रसाद याही लीजिये।।
चौ: सिद्ध श्री द्वारापुरी गामा। सकल ओपमा सांवल शाह है नामा।।
रूपया सात सौ संतो ने गिन दीजो।साढा तीन सौ रा दूना कर दीजो।।
लिखा के हुंडी चले संत वो मनमे धीरज धारी है।।
द्वारापुरी में पहुंचे संत जब हुंडी खोल दिखलायी है।
कहे नगर का ओ महाराज सेठ सांवल सा यहा कोई नाही है।
व्याकुल भये दिलगीर धरे ना धीर अकल चकराई है।
फिरे पूछता ओ महाराज सेठ सांवल की खबर नही पाई है।
दोहा: हैरत ही सब नगर को मनसु में मालूम पड़ा।
खोटी हुंडी लिख दिनी बेईमान मुथा नरसी रा।
चौपाई:
लोग कहे पीछे तुम जावो इज्जत उनकी खूब उड़ावो।
तुम तो ठग के बहुत ठगाये।
खोटी हुंडी वीरा तुम लिख लाये।
द्वारापुरी से चले संत वो मनमे चिंता न्यारी है।।
जूनागढ़ को चले संत वो जल पीने को ठहरे है।
उसी राह में ओ महाराज सेठ सांवल का लश्कर आया है।
सन्त कहे ये कौन सेठ है यो कर के बतलाया है।
सांवलशा है ओ महाराज दुकाना सम्भाल कर सीधे आया।
दोहा:
सांवल सा का नाम सुन संत जन राजी भया।
दौड़ रथ को पकड़ के परचा उनको दे दिया।
सांवलसा ने वाच परचा रुपिया सन्तों को गिण दिया।
गुनाह हमारा माफ़ करो संत जन रखजो दया।।
चौपाई:
मंगल पूरी गुरु देव गोसाईं।
नरसी भगत री रीत निभाई।
सांवल से हुंडी शिकराई
रसीद पत्रिका लीनी लिखवाई।।
कहे चित्तड़ गौड़ जोड़ यू हरी भगतन हितकारी है।।
***गोविन्द दास गंगावास***
वो तीर्थ नहाने चाले धाम।
जूनागढ़ में रेन एक लीना विश्राम।
चोरन का डर सुना राह में रखो मती तुम पल्ले दाम लिखालो हुंडी।
ओ महाराज लिखालो हुंडी।
हारे खर्च बिन विदेश में नही चलता काम।
दोहा:खरची बिन चलता नही तीर्थ में क्या काम जी।
संतजन पूछत फिरे सेठ को सिरनाम जी।
संत कहे और कौन सेठ निज नाम जी।
मसखरा ने करी मसखरी जाओ नरसी के द्वार जी।।
चौ:संत चले सीधे ही बजारा।
कोई तो बताओ मेहता नरसी का द्वारा।।
तुम्बा री बेल जठै तुलसी रा थाणा।
वठे नरसीजी करत आनंदा।।
तुम्बा तुलसी देख संत ने ये क्या दौलत धारी है।।
लिखी जो हुंडी ओ महाराज ज्योरी सांवल सेठ सिकारी है।
जूनागढ़ में नरसी मेहता भगत हुओ एक भारी है।।
संत कहे नरसी के ताहि सुण मेहताजी मोरी बात ।
मोरे पल्ले हा रे रोकड़ा खरची का रूपया सौ सात।
द्वारापुरी में हुंडी लिखदो रोकड़ लेवो अपने हाथ।
हा रे द्वारका माको तो जानो प्रभात।।
दोहा: नरसी कहे संतो को ताकीद नाही कीजिये।
प्रात:हुंडी में लिखू जा सांवल को दीजिये।
संतजन कृपा करो विश्राम याही कीजिये।
भोग लगत है ठाकुर को प्रसाद याही लीजिये।।
चौ: सिद्ध श्री द्वारापुरी गामा। सकल ओपमा सांवल शाह है नामा।।
रूपया सात सौ संतो ने गिन दीजो।साढा तीन सौ रा दूना कर दीजो।।
लिखा के हुंडी चले संत वो मनमे धीरज धारी है।।
द्वारापुरी में पहुंचे संत जब हुंडी खोल दिखलायी है।
कहे नगर का ओ महाराज सेठ सांवल सा यहा कोई नाही है।
व्याकुल भये दिलगीर धरे ना धीर अकल चकराई है।
फिरे पूछता ओ महाराज सेठ सांवल की खबर नही पाई है।
दोहा: हैरत ही सब नगर को मनसु में मालूम पड़ा।
खोटी हुंडी लिख दिनी बेईमान मुथा नरसी रा।
चौपाई:
लोग कहे पीछे तुम जावो इज्जत उनकी खूब उड़ावो।
तुम तो ठग के बहुत ठगाये।
खोटी हुंडी वीरा तुम लिख लाये।
द्वारापुरी से चले संत वो मनमे चिंता न्यारी है।।
जूनागढ़ को चले संत वो जल पीने को ठहरे है।
उसी राह में ओ महाराज सेठ सांवल का लश्कर आया है।
सन्त कहे ये कौन सेठ है यो कर के बतलाया है।
सांवलशा है ओ महाराज दुकाना सम्भाल कर सीधे आया।
दोहा:
सांवल सा का नाम सुन संत जन राजी भया।
दौड़ रथ को पकड़ के परचा उनको दे दिया।
सांवलसा ने वाच परचा रुपिया सन्तों को गिण दिया।
गुनाह हमारा माफ़ करो संत जन रखजो दया।।
चौपाई:
मंगल पूरी गुरु देव गोसाईं।
नरसी भगत री रीत निभाई।
सांवल से हुंडी शिकराई
रसीद पत्रिका लीनी लिखवाई।।
कहे चित्तड़ गौड़ जोड़ यू हरी भगतन हितकारी है।।
***गोविन्द दास गंगावास***