वैष्णव ब्राह्मणों में दान दक्षिणादि का विचार -
बहुत से हमारे भाई ब्राह्मणता के नाते से विचार करते हैं कि हम लोगों को दान दक्षिणादि लेने का अधिकार है या नहीं?
इस विषय पर विचार करने से ज्ञात होता है कि विशेष रुप से दान दक्षिणादि प्रवतिमार्गानुयायी ब्राह्मण ही लेते है।वैष्णव ब्राह्मण निवृतिमार्गानुयायी होने से दान दक्षिणादि नहीं लेते ।कारण हर मनुष्य का वामांग तो साधरणतया अशुध्द मानते हैं और दाहिना हाथ दान दक्षिणादि संकल्प लेने से अशुद्ध और दग्ध माना जाता है तो देव पुजादि कौन से हाथ से करें ?
वैष्णव ब्राह्मण देव पूजाधिकारी होने से दान दक्षिणादि को हेय, त्याज्य समझकर ग्रहण नहीं करते हैं ।इसलिए वैष्णव ब्राह्मण भारतवर्ष में देव मंदिरों के पुजारी सर्वत्र देखे और पाये जाते है।ःकिसी ने सत्य ही कहा है कि -
जिह्वा दग्धं पारान्नेषु च कर दग्धं प्रतिग्रहम्।
मनस्तु दग्धं परदारा चितनम् जप सिद्धिकथम् भवेत्।।
वैष्णव ब्राह्मण इतने उच्च आदर्श भाव सेवी हैं कि राजा दक्ष की दक्षिणा नाम की कन्या भगवान् विष्णु के सेवार्पण की ग ई थी । इसी भावना के अनुसार दक्षिणा शब्द को अपनी मातृ रूप में देखते हुए दक्षिणा को नहीं ग्रहण करते हैं। मंदिरो में भगवान् के भेंट स्वरुप जो कुछ भी आवे उसको सहर्ष ग्रहण करते हैं।
जय माराज सा
वन्दै वैराग