मानवी सभ्यता में प्रचलित
भक्ति धारा के अचल रूप को
जिस अंदाज़ से मानव मनाता है
वे सभी एक क्षणिक स्वप्न जैसे है
वस्तुतः ईश्वर के प्रति की गई हर आराधना का मूल स्वरुप खण्डित है
क्योंकि असली आनंद और वैराग तो क्रम दर क्रम बढ़ना चाहिए या यु कहे जितना परम आनंद लूटो उतना कम है यानि अनंत आनद की अनुभूति
भक्ति धारा के अचल रूप को
जिस अंदाज़ से मानव मनाता है
वे सभी एक क्षणिक स्वप्न जैसे है
वस्तुतः ईश्वर के प्रति की गई हर आराधना का मूल स्वरुप खण्डित है
क्योंकि असली आनंद और वैराग तो क्रम दर क्रम बढ़ना चाहिए या यु कहे जितना परम आनंद लूटो उतना कम है यानि अनंत आनद की अनुभूति
तो फिर इसके विपरीत परिणाम परिणाम जैसे उदासीनता या प्रभु आस्था में निष्क्रियता ये सभी लक्षण क्यों सामने आते है
इसका सीधा कारण समझ का अभाव और इससे भी बड़ा कारण
मनुष्य के नैसर्गिक मनोरंजन
करने की प्रकिया जैसे आमोद प्रमोद
सह यात्रा आनंद ये सभी असलियत में ईश्वर आस्था के धोतक न होकर केवल मन के अपरिपक्व भाव को ही दर्शाता है
इस बात में तनिक भी ठाकुर प्रेम का कोई सम्वन्ध नही है
क्या आप निर्विघ्न अकेले या मौन नीरव एकांत में इसका अनुभव किस रूप में करते ये समझने की कोशिश की
हा ये अपने आप में अजीब है परंतु तथ्य के वास्तविक प्रमाण में कोई नही झांकता
आप अकेले हो या बहुजन मगर आपकी मनो अवस्था का प्रारूप केवल भगवत प्रेम होना चाहिए
कही भी फिर ये मायने नही रह जाते के आप घुमक्कड़ हो या स्थिर
मनुष्य का स्वभाव अपने मन बहलाव में ईश्वर के प्रति समर्पण को अपने मन के खण्डित रूप से सहलुयत देता है
भ्रम में ये मानके चलता है जैसे में भक्त हूँ और द्वारा हर चेष्टा ईश्वर को भा गयी
प्रिय बंधुओ आत्म मन्थन से सोचेंगे तो समझोंग की वैराग सदा बढ़ना ही सच्चा प्रभु प्रेम में
और जब वैराग क्षणिक हो तो समझ लेना ये तो प्रमोद का छलावा है और कुछ नही
👏🏻👏🏻👏🏻🙏🙏🙏
इसका सीधा कारण समझ का अभाव और इससे भी बड़ा कारण
मनुष्य के नैसर्गिक मनोरंजन
करने की प्रकिया जैसे आमोद प्रमोद
सह यात्रा आनंद ये सभी असलियत में ईश्वर आस्था के धोतक न होकर केवल मन के अपरिपक्व भाव को ही दर्शाता है
इस बात में तनिक भी ठाकुर प्रेम का कोई सम्वन्ध नही है
क्या आप निर्विघ्न अकेले या मौन नीरव एकांत में इसका अनुभव किस रूप में करते ये समझने की कोशिश की
हा ये अपने आप में अजीब है परंतु तथ्य के वास्तविक प्रमाण में कोई नही झांकता
आप अकेले हो या बहुजन मगर आपकी मनो अवस्था का प्रारूप केवल भगवत प्रेम होना चाहिए
कही भी फिर ये मायने नही रह जाते के आप घुमक्कड़ हो या स्थिर
मनुष्य का स्वभाव अपने मन बहलाव में ईश्वर के प्रति समर्पण को अपने मन के खण्डित रूप से सहलुयत देता है
भ्रम में ये मानके चलता है जैसे में भक्त हूँ और द्वारा हर चेष्टा ईश्वर को भा गयी
प्रिय बंधुओ आत्म मन्थन से सोचेंगे तो समझोंग की वैराग सदा बढ़ना ही सच्चा प्रभु प्रेम में
और जब वैराग क्षणिक हो तो समझ लेना ये तो प्रमोद का छलावा है और कुछ नही
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